बहुत हड़बड़ी थी, उसे दुनिया में आने की
जाने का वक्त नज़दीक आ रहा था
नरेन्द्र कुमार शर्मा आगे कहते हैं, "कुदरत ने उसे बहुत अच्छी शक्ल सूरत दी थी। उसे शान और ठाठ से रहने का शौक था। २३ फरवरी २००३ में ही उसने हीरो होंडा स्प्लेंदोर खरीद ली। इसके बाद २००५ में अपनी बड़ी बहन श्वेता के श्री भारत भूषण वर्मा (एकमात्र पुत्र श्रीमती उषा और श्री इश्वर चंद्र वर्मा, गुडगाँव, हरियाणा) के साथ विवाह और उसके बाद २००७ में दूसरी बड़ी बहन शीतल की श्री अयन भट्टाचार्य (एकमात्र पुत्र श्रीमती श्यामोली और श्री अशोक कुमार भट्टाचार्य, हल्दिया, वर्धमान, बंगाल) के साथ शादी में वाकई मेरी वो मदद की, जिसकी हम सबको उम्मीद भी नही थी।'
'उसका काम और कामयाबी बढ़ती रही थी और हमारी चिंताएँ कम होने लगीं थीं । बडी बहन की शादी के बाद ना जाने उसे क्या हुआ कि अपने दोस्तों के साथ १ अप्रैल २००५ को वैष्णो देवी, आनंदपुर साहिब गुरुद्वारा और नैना देवी आदि तीर्थ घूमने चला गया। तभी उसने कई फोटो खिंचवाये जिनमें से एक यहाँ लगाया गया है। गौर करनेवाली बात है, फोटो का कैप्शन, "कल हो ना हो"।
'आख़िरी दिन.....'
२६ फरवरी २००७ को सुबह १० बजे अम्बर ने मुझे बताया, ' मुझे अपने बीमार चल रहे एक दोस्त अनिल कुमार को उसके घर से लेकर काम से जाना है।'
मैने जब उसकी माँ से कहा तो वह चिल्लाने लगी कि अभी तो इसने नाश्ता तक नहीं किया।
इसपर अम्बर बोला मैं तो बहुत जल्दी आ जाऊँगा।
मैने बहस की तो वो बोला , ' पक्का प्रोमिस। कैसे भी हो जल्दी वापस आऊँगा।'
कुछ अजीब सा लगा। मगर उसे टोकने की हिम्मत नहीं हुई। उन दिनों हम बाप बेटों में बहस भी खूब हो जाती थी। इसलिये उसे जाने दिया। पता नहीं कुदरत को क्या मंज़ूर था। वह अपनी नई कार के बजाये कडाके की उस ठण्ड में भी मोतोर्क्य्क्ले पर गया। कुछ ही देर बाद पता चला कि अम्बर दिल्ली के पोश कर्ज़न रोड के २१ केलिन लेन होते हुए फिरोजशाह रोड होता हुआ वकील लेन से बाराखम्बा रोड की सर्विस लेन के भीतर भीतर अपनी मोटर साईकिल से गुज़र रहा था कि अचानक सर्विस लेन में बेकाबू रफ्तार से आरही एक व्हाइट लाइन चार्टर्ड बस ने उसे दाहिनी और से कुचल दिया। इसी जानलेवा टक्कर ने उसके प्राण ले लिये। उसके दोस्त अनिल को भी घातक चोटें आयीं और उसकी दाईं टांग टूट गयी।
अगले दिन अखबारों में नेपाल दूतावास के ठीक सामने हुये इस भीषण हादसे में व्हाइट लाइन बस के फरार ड्राईवर पवन कुमार की लापरवाही की वजह से इस दुर्घटना का शिकार बने एक वयोवृद्ध दम्पती श्रीमती आभा तथा श्री संत प्रसाद सिंह का किस्सा भी छपा था। उनका बजाज चेतक स्कूटर इसी बस ने कुचल दिया था और वे भी गंभीर रूप से घायल हुये थे।'
' मुझे याद है कि किस तरह उसकी माँ बिलख रही थी कि तू तो वापस आने का वादा करके गया था। नाश्ता तक नहीं किया। अच्छा पक्का प्रोमिस किया तूने। अच्छा यकीं किया हमने। मगर किया ही क्या जा सकता था। जिसे जन होता है। ' उसे वापस कौन ला सकता है।
उसकी कामयाबी का राज़
अम्बर एक मामूली पढ़ा लिखा लड़का था। ना वो इंजिनियर था और ना एमबीऐ और ना उसके पास कोई दूसरी प्रोफेशनल योग्यता थी। फ़िर भी उसने बिना कोई ग़लत काम किये सिर्फ़ २८ साल की उम्र तक बहुत बढ़िया स्तर हासिल किया। परिवार कि रुपये पैसे से मदद की, मोटर और कार ख़रीदी और ये सब उसने सिर्फ़ तीन बातों पर ध्यान देकर हासिल किया :
१- कुछ भी करो लगातार नये संपर्क विकसित करते
२- लोगों के काम आने में कभी ढिलाई ना करो।
३- अपने संपर्कों की मदद और सलाह से नया कम हासिल को और पूरी ईमानदारी से नतीजे देने की कोशिश करो।
बहुत याद आते हो अम्बर!
अपने आसुओं को काबू करने कि नाकाम कोशिशों के बीच नरेन्द्र कुमार शर्मा अंत में कहते हैं, '..... मैं अब ५७ साल का हो रहा हूँ। नौकरी के तीन साल और सबसे छोटी बेटी शिखा का विवाह बाकी हैं। हमारा सबसे महत्वपूर्ण सहारा उस हादसे ने छीन लिया है। आजकल उसे याद करने और उसी दुर्घटना के जिम्मेदार ड्राईवर को सज़ा के फैसले के आत्मनिर्भर होने का इंतजार ही अब मेरे जीने का मकसद हैं। ... '
अम्बर वापस आगया !
रविवार १६ नवम्बर २००८, सुबह करीब ६ बजे दिल्ली से मेरे भाई नरेन्द्र कुमार शर्मा का फ़ोन आया। बहुत भावुक स्वर में उन्होने पुछा, ' शीतल हॉस्पिटल में भारती है। तुम ज्योतिष जानते हो बताओ अब क्या होगा?' मैने जवाब दिया,' अम्बर वापस आएगा। आप उससे बहुत याद करते हैं ना।'
करीब तीन घंटे बाद उनका फ़ोन आया। खुशी में रो रहे ,' अशोक अम्बर वापस आगया।'
शीतल ने दिल्ली के एक नर्सिंग होम में ठीक उसी समय अपने पुत्र को जन्म दिया, जिस वक्त अम्बर दुनिया से गया था।
जैसे कल ही की
बात है। मेरे सगे फुफेरे भाई नरेन्द्र कुमार शर्मा के घर, एल-१३६, सरोजिनी नगर नई दिल्ली में चार जून आधी रात के बाद और पाँच जून १९७९ की सुबह करीब १।१० बजे उनके पहले बेटे का जन्म बिना किसी पूर्वानुमान के अचानक और एक अनोखी घटना की तरह हुआ।
बात है। मेरे सगे फुफेरे भाई नरेन्द्र कुमार शर्मा के घर, एल-१३६, सरोजिनी नगर नई दिल्ली में चार जून आधी रात के बाद और पाँच जून १९७९ की सुबह करीब १।१० बजे उनके पहले बेटे का जन्म बिना किसी पूर्वानुमान के अचानक और एक अनोखी घटना की तरह हुआ।
मेरे भाई और भाभी श्रीमती प्रभा शर्मा बाबु मार्केट के पास रात का खाना खाने के बाद टहल रहे थे। अचानक ही भाभी को लगा कि उन्हे प्रसव पीड़ा शरू हो गयी है। भाई साहेब के हाथ पाँव फूल गये। वे फौरन ही भाभी को लेकर सरोजिनी नगर में ही नगर पालिका प्रसूति केन्द्र भागे, और कोई विकल्प भी नहीं था। वहां जाते ही डॉक्टरों ने उन्हें फौरन ही प्रसव हेतु जरूरी कुछ मेडिकल सामान लाने को कहा। .....और इस तरह एक मामूली अस्पताल में केंद्रीय लोक निर्माण विभाग के इन्द्रप्रस्थ भवन में निर्माण मंडल के एक कम तनखाह पानेवाले क्लर्क के घर उस बच्चे का जन्म हुआ जिसकी ज़िन्दगी की कहानी छोटी ज़रूर है मगर प्रेरणा देनेवाली है कि लगातार कोशिशों से कम समय में भी कोई कामयाब हो सकता है। बस मन में एक तड़प चाहिये।
कमाने की तमन्ना में बीता बचपन
मेरे भाई नरेन्द्र कुमार शर्मा बताते हैं कि अम्बर को बचपन से ही कुछ कर दिखाने और घर में अपना आर्थिक योगदान देने की जल्दी थी। उसके खेल भी इसी तरह के होते थे । बच्चों का प्रसिद्ध गेम बिज़नस, क्रिकेट और तरह तरह की प्रतियोगिताएं जीतना उसकी हॉबी था। यह बात और है कि उसका मन पढ़ने में नहीं लगता था।
" हम लोग कहते भी थे कि अगर पढोगे नहीं तो कामयाब कैसे होगे? वह कहता था हो जाऊंगा। इस बात पर उसकी मार भी पड़ती थी। वह कहता था बडे बडे उद्योगपति स्कूल कॉलेज से कामयाब नही हुये, अप
नी अक्ल से हुए हैं।
नी अक्ल से हुए हैं।
'' १९९५ में वह आठवीं में पढता था कि मोहल्ले की एक औरत ने घर आकर शिकायत की, कि अम्बर सरोजिनी नगर एम् ब्लाक बस अड्डे के पास साइकिल के पंचर जोड़ने की दूकान लगाये बैठा है। उसे घर लाकर पीटा गया। मासूमियत से बोला कि पापा पैसे कमाने जरुरी हैं तभी तो हम अमीर बनेंगे। कुछ दिन बाद उसने मेरे मित्र राम मूर्ति पराशर के बडे बेटे आशु पराशर के साथ डाकुमेंट श्रेडर (गोपनीय दस्तावेज़ नाश्ता करने की मशीन) बेचने का काम पकड़ लिया। हमने माथा पकड़ने का काम बंद कर दिया। सोच लिया कि इसे एक दो साल गवां कर ही इसे अक्ल आनी है। ...मगर वह तो वाकई चल निकला।
"...कई छोटी मोटी नोकरियों में हाथ आजमाने के बाद वह नवम्बर १९९९ में जीई कंट्री वाइड कंपनी की सहयोगी कंपनी ऑफ़शूट का कलेक्शन सुपरवाईज़र बन गया और २५ हज़ार रुपए महीना कमाने लगा। वहां से भी कुछ ही सालों में वह उकता गया और दिसम्बर २००५ में ही उसने अपने बॉस विपुल उप्रेती के साथ मिलकर लाजपत नगर पार्ट १ में परफेक्ट प्लानेट इंटरप्रिजेस नामक कंपनी खोली। यह कंपनी एचडीऍफ़सी बैंक के लिये काम करती थी।"
जाने का वक्त नज़दीक आ रहा था
'उसका काम और कामयाबी बढ़ती रही थी और हमारी चिंताएँ कम होने लगीं थीं । बडी बहन की शादी के बाद ना जाने उसे क्या हुआ कि अपने दोस्तों के साथ १ अप्रैल २००५ को वैष्णो देवी, आनंदपुर साहिब गुरुद्वारा और नैना देवी आदि तीर्थ घूमने चला गया। तभी उसने कई फोटो खिंचवाये जिनमें से एक यहाँ लगाया गया है। गौर करनेवाली बात है, फोटो का कैप्शन, "कल हो ना हो"।
''हमें पता ही नहीं चला कि कैसे वक्त बीतने के साथ हमारा बेटा हमारा सहारा बनता जा रहा था। आज लगता है कि उसे परमात्मा ने सिर्फ़ हमारे काम संभालने के लिये भेजा था। 2४ जनवरी २००७ को अपनी दूसरी बड़ी बहन शीतल की शादी से तीन दिन पहले २१ जनवरी को उसने आईसीसीआई बैंक से लोन लेकर ओखला के एक मारुती कार डीलर से सिल्वर कलर वेगनआर गाडी खरीद ली। इसी गाडी में शीतल के दुल्हा अयन हमारे घर पर बरात लेकर आये और शीतल के बिदाई भी इसी गाडी में हुई।
'आख़िरी दिन.....'
२६ फरवरी २००७ को सुबह १० बजे अम्बर ने मुझे बताया, ' मुझे अपने बीमार चल रहे एक दोस्त अनिल कुमार को उसके घर से लेकर काम से जाना है।'
मैने जब उसकी माँ से कहा तो वह चिल्लाने लगी कि अभी तो इसने नाश्ता तक नहीं किया।
इसपर अम्बर बोला मैं तो बहुत जल्दी आ जाऊँगा।
मैने बहस की तो वो बोला , ' पक्का प्रोमिस। कैसे भी हो जल्दी वापस आऊँगा।'
कुछ अजीब सा लगा। मगर उसे टोकने की हिम्मत नहीं हुई। उन दिनों हम बाप बेटों में बहस भी खूब हो जाती थी। इसलिये उसे जाने दिया। पता नहीं कुदरत को क्या मंज़ूर था। वह अपनी नई कार के बजाये कडाके की उस ठण्ड में भी मोतोर्क्य्क्ले पर गया। कुछ ही देर बाद पता चला कि अम्बर दिल्ली के पोश कर्ज़न रोड के २१ केलिन लेन होते हुए फिरोजशाह रोड होता हुआ वकील लेन से बाराखम्बा रोड की सर्विस लेन के भीतर भीतर अपनी मोटर साईकिल से गुज़र रहा था कि अचानक सर्विस लेन में बेकाबू रफ्तार से आरही एक व्हाइट लाइन चार्टर्ड बस ने उसे दाहिनी और से कुचल दिया। इसी जानलेवा टक्कर ने उसके प्राण ले लिये। उसके दोस्त अनिल को भी घातक चोटें आयीं और उसकी दाईं टांग टूट गयी।
अगले दिन अखबारों में नेपाल दूतावास के ठीक सामने हुये इस भीषण हादसे में व्हाइट लाइन बस के फरार ड्राईवर पवन कुमार की लापरवाही की वजह से इस दुर्घटना का शिकार बने एक वयोवृद्ध दम्पती श्रीमती आभा तथा श्री संत प्रसाद सिंह का किस्सा भी छपा था। उनका बजाज चेतक स्कूटर इसी बस ने कुचल दिया था और वे भी गंभीर रूप से घायल हुये थे।'
' मुझे याद है कि किस तरह उसकी माँ बिलख रही थी कि तू तो वापस आने का वादा करके गया था। नाश्ता तक नहीं किया। अच्छा पक्का प्रोमिस किया तूने। अच्छा यकीं किया हमने। मगर किया ही क्या जा सकता था। जिसे जन होता है। ' उसे वापस कौन ला सकता है।
उसकी कामयाबी का राज़
अम्बर एक मामूली पढ़ा लिखा लड़का था। ना वो इंजिनियर था और ना एमबीऐ और ना उसके पास कोई दूसरी प्रोफेशनल योग्यता थी। फ़िर भी उसने बिना कोई ग़लत काम किये सिर्फ़ २८ साल की उम्र तक बहुत बढ़िया स्तर हासिल किया। परिवार कि रुपये पैसे से मदद की, मोटर और कार ख़रीदी और ये सब उसने सिर्फ़ तीन बातों पर ध्यान देकर हासिल किया :
१- कुछ भी करो लगातार नये संपर्क विकसित करते
२- लोगों के काम आने में कभी ढिलाई ना करो।
३- अपने संपर्कों की मदद और सलाह से नया कम हासिल को और पूरी ईमानदारी से नतीजे देने की कोशिश करो।
बहुत याद आते हो अम्बर!
अपने आसुओं को काबू करने कि नाकाम कोशिशों के बीच नरेन्द्र कुमार शर्मा अंत में कहते हैं, '..... मैं अब ५७ साल का हो रहा हूँ। नौकरी के तीन साल और सबसे छोटी बेटी शिखा का विवाह बाकी हैं। हमारा सबसे महत्वपूर्ण सहारा उस हादसे ने छीन लिया है। आजकल उसे याद करने और उसी दुर्घटना के जिम्मेदार ड्राईवर को सज़ा के फैसले के आत्मनिर्भर होने का इंतजार ही अब मेरे जीने का मकसद हैं। ... '
अम्बर वापस आगया !
रविवार १६ नवम्बर २००८, सुबह करीब ६ बजे दिल्ली से मेरे भाई नरेन्द्र कुमार शर्मा का फ़ोन आया। बहुत भावुक स्वर में उन्होने पुछा, ' शीतल हॉस्पिटल में भारती है। तुम ज्योतिष जानते हो बताओ अब क्या होगा?' मैने जवाब दिया,' अम्बर वापस आएगा। आप उससे बहुत याद करते हैं ना।'
करीब तीन घंटे बाद उनका फ़ोन आया। खुशी में रो रहे ,' अशोक अम्बर वापस आगया।'
शीतल ने दिल्ली के एक नर्सिंग होम में ठीक उसी समय अपने पुत्र को जन्म दिया, जिस वक्त अम्बर दुनिया से गया था।
